आंटी का मदमस्त जिस्म
आपको पता ही है कि पूरे देश में 22 मार्च को लॉकडाउन का आदेश आ गया था.
मैं भी सभी की तरह घर पर ही था. सभी कुछ बंद था.
धीरे धीरे दिन बढ़ते जा रहे थे. हमें जो काम करना भी अच्छे लगते थे, उन्हें कर करके बोर हो चुके थे.
लॉक डाउन के दौरान दो दिन के लिए बाजार खुलने का आदेश आया तो सभी को घर की जरूरतों का सामान लेने की लालसा जा गई.
मेरे पापा ने भी मुझसे कहा- आगे का कोई भरोसा नहीं कि कब तक लॉकडाउन लगा रहे. तुम कल जल्दी उठ जाना और मंडी से सब्जी लेने चलना है.
मैंने ऐसा ही किया और अगली सुबह मैं बड़ी भोर 3 बजे ही उठ गया. ब्रश वगैरह करके मैं तैयार हो गया.
पापा को उठाया मैंने … और हम दोनों कार से मंडी के लिए निकल गए.
मैंने कुछ ज्यादा ही पैसे जेब में रख लिए थे.
जब हम वहां पहुंचे, तो उधर का नजारा देख कर ही मेरा दिमाग़ घूम गया. ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर उठ कर आ गया हो.
ये नजारा देख कर मुझे इतना तो समझ आ गया था कि इधर 2 घंटे से कम नहीं लगेंगे.
पापा ने कहा- तू यहां बैठ, मैं अन्दर से सब्जी वगैरह लेकर आता हूँ.
मंडी के अन्दर पैर रखने की जगह नहीं थी, तो पापा पीछे की तरफ से अन्दर चले गए.
पापा के जाने के बाद मैं वहीं अपनी गाड़ी में बैठ कर फ़ोन में गेम खेलने लगा.
तभी मैंने देखा कि वहां मंडी के बाहर एक 35-36 साल की औरत झुक कर कुछ कर रही थी.
दरअसल मंडी के बाहर रोड पर जो गंदा पानी पड़ा था, उसमें कुछ खराब सब्जियां पड़ी हुई थीं. वो महिला उनको उठा-उठा कर एक झोले में डाल रही थी.
मैं ये सब देख कर थोड़ा हैरान हुआ.
मैंने अपना फ़ोन चलाना बंद किया और अपनी गाड़ी से उतर कर उस औरत के पास आ गया.
उससे मैंने कहा- अरे आंटी ये आप क्या कर रही हो. ये तो काफी गंदी सब्जियां हैं. इनसे तो आप और ज्यादा बीमार हो जाओगी. वैसे भी कोरोना चल रहा है और आपकी ये लापरवाही ठीक नहीं है.
आंटी ने मेरी तरफ देखा, तो मैं उन्हें देखता ही रह गया.
वो काफी सुन्दर थीं. उन्होंने काले कलर की साड़ी पहन रखी थी और हरे रंग का ब्लाउज पहना था.
उनका वो ब्लाउज उनके कंधे से थोड़ा फटा सा था और वो झुकी हुयी थीं, तो साड़ी का पल्लू भी सही नहीं था.
जैसे ही वो मेरे टोकने पर उठीं, तो मैंने देखा कि उनके ब्लाउज में एक हुक नहीं है. इस वजह से वो खुला सा था. आंटी का फटा हुआ ब्लाउज देख कर मैं सब भूल गया कि मैं उनसे क्या बोलने वाला था.
वो मेरी तरफ देख कर बोलीं- साहब, भूखे मरने से अच्छा है कि खा कर मरो. मेरे तीन छोटे छोटे बच्चे हैं. उनके लिए खाने के लिए कहां से लाऊं? इस बीमारी चक्कर में मजदूरी का काम भी बंद हो गया है. मेरे पास पैसे भी बिल्कुल नहीं हैं. अपने बच्चों को क्या खिलाऊं. आज मंडी खुली है, तो सड़कों पर सब्जी मिल भी गई … वरना ये भी नहीं मिलती. आप अन्दर जाकर देखो, सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं.
मुझे आंटी के मुँह से ये सब सुनकर बड़ा अजीब सा लगा.
मैंने कहा- ये लॉकडाउन तो अभी काफी दिन तक चलेगा. दो दिन बाद तो मंडी भी बंद हो जाएगी, फिर आप अपना गुजारा कैसे करेंगी?
वो रोते हुए बोलीं- जब तक ज़िंदा हैं, तब तक किसी तरह से जी लेंगे. मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा है कि क्या करूं?
मैंने पूछा- आपके पति या भाई वगैरह नहीं है क्या?
वो बोलीं- हां पति तो हैं, मगर वो दिल्ली में फंस गए हैं और वापस आने का कोई साधन ही नहीं है.
ये कह कर वो और तेज़ रोने लगीं और रोते हुए ही बोलीं- साहब, मुझे कैसा भी काम नहीं मिल रहा है. कोई बर्तन झाड़ू के लिए भी कोई घर नहीं बुला रहा है.
मैंने कहा- अरे आप परेशान ना हों … प्लीज़ रो मत.
मेरी बात सुनकर वो चुप हुईं और मंडी के उलटे हाथ वाली गली में जाने लगी.
मैंने उन्हें रोका और कहा- आप कहां जा रही हैं?
आंटी- अपने घर!
मैंने कहा- चलो, मैं आपको छोड़ देता हूँ.
आंटी- ना ना साहब, ये सामने जो झोपड़ी बनी है न … ये मेरी ही है. दूसरी वाली झोपड़ी में मेरे बच्चे सो रहे हैं.
मैं उनके साथ ही चल पड़ा.
वो दूसरी वाली झोपड़ी में घुस गई.
मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या करूं.
एक मिनट तक सोचने के बाद मैं भी उसी झोपड़ी में घुस गया.
वो मुझे अन्दर आता देख कर बोलीं- अरे क्या हुआ साहब … इस गरीब की कुटिया में आप?
मैंने कहा- पानी मिलेगा?
वो आंटी हंस कर बोलीं- जरूर साहब इसी से तो पेट भर रहे हैं अब तक!
वो पानी लेने को पलटीं … तो मैं वहीं बैठ गया.
आंटी एक गिलास में पानी लेकर आईं और उन्होंने मुझे पानी दिया.
मैंने देखा कि उनकी चारों उंगलियां उसी गिलास में डूबी थीं, तो ये देख कर ही मेरी प्यास बुझ गई.
मैंने कहा- आप बैठो, आप ऐसी ख़राब सब्जी अपने बच्चों का ना खिलाया करें वरना उनकी तबियत काफी बिगड़ सकती है … और हॉस्पिटल में इलाज होना भी मुश्किल हो जाएगा.
वो बोलीं- साहब कल से घर में खाने को कुछ नहीं है … मैंने भी कुछ नहीं खाया है. घर में तेल आटा कुछ नहीं है. उठते ही बच्चे खाना मांगेंगे, तो उन्हें क्या खिला सकूंगी.
मैंने कहा- रुको.
मैंने अपनी जेब से उन्हें 5000 रुपए दिए.
तो वो लेने से मना करने लगी.
मैंने कहा- रख लो काम आएंगे.
वो बोलीं- अरे साहब ये काफी ज्यादा हैं, इतना तो मैं एक महीने में कमा पाऊंगी.
मैंने कहा- रख लो.
वो झुक कर मेरे पैर छूने लगीं, तो उनका पल्लू नीचे गिर गया.
मैंने आंटी के हाथ पकड़ कर ऊपर उठाया, तो उनका पल्लू नीचे रह गया.
वो जब उठ कर खड़ी हुईं, तो उनके ब्लाउज के बीच से जहां हुक नहीं था … वहां से उनका थोड़ा सा बूब दिख रहा था.
मैंने उनके दूध को देखते हुए कहा- आप रुको, मैं कुछ लेकर आता हूँ. आप यहीं रहो.
मैं उस झोपड़ी से बाहर निकला, तो मेरे मन में अलग ही ख्याल आने लगे. मैंने थोड़ा सोचा और दोबारा उस झोपड़ी में घुस गया.
मैंने कहा- अगर आपको किसी और चीज की जरूरत हो, तो इस नंबर पर फ़ोन लगा लेना. बाकी अभी कुछ देर बाद आपको कुछ सब्जी वगैरह तो दिलवा ही दूंगा.
वो बोलीं- साहब, हमारे पास फ़ोन नहीं है. आपने इतना तो कर दिया है … और क्या जरूरत पड़ेगी. आप तो भगवान का रूप बन कर आए हैं.
मैंने अपनी जेब से 2000 रुपए और निकाल कर उन्हें दिए.
तो वो लेने से मना करने लगीं.
आंटी- साहब अब इतना अहसान नहीं चाहिए … आप पहले ही काफी कर चुके हैं.
मैंने कहा- अहसान वाली बात नहीं है.
वो बोलीं- आपका जो भी काम होगा, मैं ख़ुशी ख़ुशी कर दूंगी.
मैंने कहा- अरे ऐसी जरूरत नहीं है. आप इन पैसों को रख लो और अपने लिए कुछ कपड़े भी खरीद लेना.
वो मेरा धन्यवाद करने लगीं और बोलीं- हम आपका ये अहसान कैसे चुका पाएंगे.
मैंने कहा- अरे इसमें कोई अहसान की बात नहीं है बस आप साफ तरीके से रहा करो … और नहा कर ही खाना बनाया करो.
वो बोलीं- ठीक है … अब से मैं ऐसा ही करूंगी साहब.
मैंने कहा- अभी मेरे पापा सब्जी लेकर आने वाले हैं, मैं आपको उनसे कुछ सब्जी दिलवा दूंगा. तब तक आप नहा लो, जिससे साफ सुथरे होकर ही सब्जी लेना. अभी आप गंदे पानी में घूम रही थीं.
आंटी बोलीं- आप यहां बैठिए. मैं नहा कर आती हूँ.
मैंने कहा- कहां जा रही हो आप?
उन्होंने कहा- हम सभी बाहर इस झोपड़ी के पीछे नहाते हैं.
मैंने कहा- ठीक है.
वो नहाने चली गईं.
मैं 5 मिनट तक बैठे बैठे उन आंटी की मस्त जवानी को ही सोचने लगा. मेरे मन में बड़े हवस भरे ख्याल आ रहे थे.
मेरी आंखों के सामने बार बार उनके बड़े और भरे हुए मम्मे ही आ रहे थे. मुझसे रहा नहीं गया और मैं उठ कर झोपड़ी के पीछे चला गया.
वहां चुपके से उन आंटी को देखने लगा.
वो पेटीकोट पहन कर बैठ कर नहा रही थीं, उनके पेटीकोट से दबे हुए चूचे बहुत ही अच्छे और ऐसे दिख रहे थे, जैसे एकदम गोल गोल संतरे हों. मुझे ऐसा लग रहा था कि इन्हें चूस लूं.
वो अपने ऊपर पानी डाल रही थीं और हाथ से ही अपने बदन को रगड़ रही थीं.
कुछ पल बाद शायद उनका नहाना कम्पलीट हो चुका था. उन्होंने अपना पेटीकोट उतारा और अपनी गीली चड्डी पहने हुए ही साड़ी लपेट ली फिर अपने नीचे से चड्डी को उतार कर निकाल दिया.
अब आंटी ने बैठ कर ब्लाउज और पेटीकोट, चड्डी को धोया और जैसे ही वो झोपड़ी की तरफ मुड़ीं, मैं वापिस झोपड़ी में आ गया.
वो जैसे ही झोपड़ी में आईं, तो मैं आंटी को देखता ही रह गया.
आंटी बला की खूबसूरत थीं.
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